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मोरंगा या सहेजन की खेती

UK Atheya / Agriculture, Moringa /

मोरंगा या सहेजन की पत्ती कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पशुओं के लिए साल भर चारा प्राप्त कराती है। यह 100 मिट्रिक टन चारा प्रति हेक्टेअर एक बार फसल लगानें से 3 वर्ष तक फसल देती है।

इसका चारा अधिक प्रोटीन वाला तथा विटामिनों से भर पूर होता है। आप इसके बारे में विशेष ज्ञान एन.डी.डी.वी. के यूटय्ब पर देख सकते है। तथा आप डा. सैसैना से 9425301288 पर संपर्क कर सकतें है। मारंगा की खेती ऐसे स्थानों पर बहुत लाभकारी हैं जहां कि वर्षा बहुत कम होती है।
मोरंगा का चारा खिलाने से पशुओं के वजन में 32 प्रतिशत वृद्धि होती हैं तथा दूध में 43 से 63 प्रतिशत तक वृद्धि होती है। मोंरंगा की खेती सूखाग्रस्त क्षेत्रों में बहुत लाभकारी है। मोरंगा में 18 अमिनो एसिड़ होते है। जिनमें से 9 अति आवश्यक अमिनो एसिड़ होते है। इसमें विटामिन ई एवं सिलिनियम होता है। मोरंगा डायविटिज, कोल एन कैंसर एवं ह्दय रोग में लाभकारी है।

चारे का साईलेज (अचार) बनाना

बरसात में जब अधिकाधिक मक्का की खेती होती है। जब मक्का को काटकर आॅक्सीजन रहित स्थान पर 45 दिन तक रखने से मक्का साईलेज बनता है। इसे गाय भैंस को खिलाकर अधिक दूध उत्पादन कर सकते है। जब मक्का के दाने दूधिया होते हैं, तब मक्का की चरी को एक ईंच से छोटी काटकर बंकर में रखकर ट्रैक्टर द्वारा कुचलकर उसकी वायु को निकाल देते है। एवं बंकर को आप प्लास्टिक से ढककर 45 दिन के लिए सील कर दें। सील करने से पहले 5 प्रतिशत गुड़ का घोल कटे हुए चारे पर छिडक दें। इस प्रकार से पूरे खेत की पफसल को आप एक दिन में काटने के बाद आप दूसरी फसल बो सकते है। तथा आप प्रतिदिन चारा काटने की परेशानी से भी बच सकते है। बंकर का चित्र दर्शाया गया हैं। इसकी विधि को विस्तार से देखने के लिए आप यू-ट्यूब की सहायता ले सकते है।
भारत में कम दूध देने वाले पशु भूसे और दानें पर पाले जाते है। जहां हरित क्रांति हो गई है और सिंचाई के साधन उपलब्ध है वहां हरा चारा और गन्ने का अंगोला दिया जाता है। जहां खेती छोड़कर किसान छोटा किसान दुग्ध उत्पादन में लिप्त है। वहां वह हरा चारा उगाता है। जहां जमीन उपलब्ध नहीं है तथा दूध की कीमत अधिक है वहां पर पशुओं को भूसे तथा दाने पर रखा जाता है। देहरादून उसका एक उदाहरण है। भूसे, दानें और सिरे को मिलाकर 14 किग्रा की कम्पैक्ट भेली भी उपलब्ध है। जिसमें भंडारण में आसानी होती है। तथा दानें और चारे को अलग देनें की आवश्यकता नहीं होती है। लेकिन यह 10 लीटर तक दूध देने वाले चशुओं के लिए लाभकारी है। आजकल बहुत सी कंपनियां रेडिमेंड़ दाना देती है। जिसमें खल, आनाज आदि मिला होता है। अधिकत्तर कंपनियां खल में बचत करने के लिए दानें में एक प्रतिशत यूरिया का भी उपयोग करते है।

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